सोमवार, जुलाई 11, 2011

मेहनत


तकदीर नहीँ , हाथोँ की मेहनत
पहुँचाती साहिल तक हमको।

रेल नहीँ , रेल की पटरी
ले जाती मंजिल तक हमको।

है जब तक हाथोँ मेँ ताकत
तकदीर हमारी हम खुद हैँ ।

हिम्मत हार के हम अपनी
सारे दुःख के कारण खुद हैँ।

कदम बढ़ाएं अगर संभलकर
गिरने की कोई बात नहीँ।

कभी सुबह नही हो जिसकी
ऐसी कोई रात नहीँ।

अपनी राहोँ के दीपक बन
स्वयं प्रकाश करना है सबको।

तकदीर नहीँ हाथोँ की मेहनत
पहुँचाती साहिल तक हमको।

6 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत खूब, हमारे हाथों में ही हमारा विश्व है।

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

है जब तक हाथोँ मेँ ताकत
तकदीर हमारी हम खुद हैँ ।
sach me aameeen!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

हिम्मत हार के हम अपनी
सारे दुःख के कारण खुद हैँ।

कदम बढ़ाएं अगर संभलकर
गिरने की कोई बात नहीँ।

बहुत सही ...अच्छी गजल

Unknown ने कहा…

हिम्मत हार के हम अपनी
सारे दुःख के कारण खुद हैँ।

बढ़िया....

Murari Pareek ने कहा…

josh kharosh se bhari hai aapki rachnaa !! sundar !!

Amrita Tanmay ने कहा…

बहुत ही खुबसूरत