शुक्रवार, अक्तूबर 21, 2011

प्रगति पथ पर बढ़ता मानव


मानव विकास की चाह मेँ।
बढ़ता हुआ इंसान।।

भौतिक सुखोँ की तलाश मेँ।
प्रकृति के नियमोँ का उल्लंघन कर।
एकांकी बन गया इंसान।।

सर्वशक्तिमान बननेँ की चेष्टा मेँ।
अति दुर्बल हो गया इंसान।।

विश्व को साथी बनाने के भ्रम मेँ।
स्वयं का साथ खो बैठा है इंसान।।

सदियोँ सुरक्षित रहनेँ की आकांक्षा मेँ।
पलभर का साथ खो बैठा इंसान।।

गगन चुंबी इमारतेँ बना-बना कर।
नम्रता की गहराइयाँ भूल गया है इंसान।।

विमुक्त हो जा इन विरोधाभासोँ से।
अग्रसित हो जा समन्वय की ओर।
अभी भी समय है रूख बदलने का।
प्रेरित हो जा समन्वय की ओर।।

7 टिप्पणियाँ:

केवल राम : ने कहा…

सर्वशक्तिमान बननेँ की चेष्टा मेँ।
अति दुर्बल हो गया इंसान।।

विश्व को साथी बनाने के भ्रम मेँ।
स्वयं का साथ खो बैठा है इंसान।।

वाह ! इंसान आज तेरी हालात क्या हो गयी है और फिर भी तू संभलने का नाम नहीं ले रहा है ....बहुत सशक्त तरीके से अभिव्यक्त की है अपने भावनाओं को ....!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कितना कुछ पा रहा पर कितना कुछ खो रहा इंसान।

सामाजिकता के दंश ने कहा…

कहते तो हम भी यही हैँ

मगर

सिर्फ बुदबुदा कर रह जाते हैँ

अन्दर के अहसास

अन्दर ही रह जाते हैँ.

Kunwar Kusumesh ने कहा…

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ.

NISHA MAHARANA ने कहा…

सदियोँ सुरक्षित रहनेँ की आकांक्षा मेँ।
पलभर का साथ खो बैठा इंसान।।
भगवान बनने की चाहत में हैवान बन गया मानव।
बहुत अच्छी प्रस्तुति। धन्यवाद।

SAJAN.AAWARA ने कहा…

ek din sab gavan dega ye insan..
jai hind jai bharat

Mohsin.ansary ने कहा…

बहुत अच्छी कविता है