शनिवार, सितंबर 24, 2011

वर्षा ऋतु


कारे कजरारे बादलोँ की घटा छा रही,
सारा आसमां सबही के मन भाया है।

घन बीच चपला चम रही चहुँ ओर,
गर्जन की गरूता ने तन थहराया है।

हो रही वृष्टि मानो डूबैगी ये सृष्टि सारी,
महिमा अपार देखो करके विचार।

धन्य है! प्रभु जो ऐसी रचना रचाया है,
सारा आसमां सबही के मन भाया है।

5 टिप्पणियाँ:

केवल राम : ने कहा…

धन्य है! प्रभु जो ऐसी रचना रचाया है,
सारा आसमां सबही के मन भाया है।

प्रभु तो है ही धन्य और आपने ग़ज़ल भी उसी अंदाज में लिखी है ...हम भी पढ़कर हो गए धन्य .....आपका आभार

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

प्रभु की महिमा।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति ... अब बारिश का मौसम गया ..

Kunwar Kusumesh ने कहा…

अब जाड़ा दस्तक दे रहा है.

Dr. Ashok palmist blog ने कहा…

केवल राम जी
प्रवीण पाण्डेय जी
संगीता स्वरूप जी
कुवँर कुशमेश जी

आप सभी का ब्लोग पर आकर मेरा उत्साहबर्धन के लिए बहुत-बहुत आभार जी ।