रविवार, नवंबर 14, 2010

जो भी पाया था कभी खुदा से मैँने

जो भी पाया था कभी खुदा से मैँने
कुछ पल ही रूका था वो पास मेरे

वक्त की अगर कोई सीमा होती तो
वो कद्र करता हर जज्बात की मेरे


पाने की आरजू मेँ जिसे जीये जा रहा हूँ मैँ
वो ही घटा रहा है क्यूँ धड़कने दिल की मेरे

बना करते हैँ अगर रिश्ते सभी विश्वास की डोर से
फिर घटा ही क्युँ रहा है वो विश्वास को मेरे

मिलती है सभी को अगर मौहब्बत नसीबोँ के खेल से
फिर मिटा क्यूँ रहा है लकीरोँ को हाथोँ से मेरे

27 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

भगवान की कृपा दृष्टि बने रहे उनके प्रशंसकों पर।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बना करते हैँ अगर रिश्ते सभी विश्वास की डोर से
फिर घटा ही क्युँ रहा है वो विश्वास को मेरे..

बनाये रखिये विश्वास ....अच्छी प्रस्तुति

Unknown ने कहा…

मिलती है सभी को अगर मौहब्बत नसीबोँ के खेल से
फिर मिटा क्यूँ रहा है लकीरोँ को हाथोँ से मेरे

uttam prastuti!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

बना करते हैँ अगर रिश्ते सभी विश्वास की डोर से
फिर घटा ही क्युँ रहा है वो विश्वास को मेरे
waah

Archana ने कहा…

bahut khoob likha hai....vishwas banaye rakhiye....shubkamnaye

Bharat Bhushan ने कहा…

हाथ की लकीरें बनती हैं, बनाई जाती हैं. विश्वासं फलदायकं.

Kunwar Kusumesh ने कहा…

सुन्दर अति सुन्दर

www.navincchaturvedi.blogspot.com ने कहा…

एक डाक्टर जब पामिस्ट्री से गुज़रता हुआ कोई कविता लिखता है तो ऐसी सुंदर कविता का सृजन स्वाभाविक होता है अशोक भाई| बधाई| हमारे ब्लॉग पर भी उपस्थिति दर्ज करने की कृपा करें|
http://thalebaithe.blogspot.com

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

bahut sundar!!

निर्मला कपिला ने कहा…

कविता अच्छी लगी। धन्यवाद।

DR.ASHOK KUMAR ने कहा…

@प्रवीण पाण्डेय जी
@संगीता स्वरूप जी
@डाँ. अरुणा कपूर जी
@अर्चना धनवानी जी
@रश्मि प्रभा जी

आप सभी का ब्लोग पर आने तथा आपके स्नैह के लिए शुक्रिया जी।

DR.ASHOK KUMAR ने कहा…

@कुवँर कुसुमेश जी
@निर्मला कपिला जी
@मुकेश जी
@नवीन जी
@ भूषणजी

आप सभी का ब्लोग पर आने तथा आपके स्नैह के लिए हार्दिक धन्यवाद जी।

अनुपमा पाठक ने कहा…

vishwas bana rahe!
sundar rachna!
shubhkamnayen!!!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

वक्त की अगर कोई सीमा होती तो
वो कद्र करता हर जज्बात की मेरे...
वाह...बहुत अच्छा है.

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

वक्त की अगर कोई सीमा होती तो
वो कद्र करता हर जज्बात की मेरे...
वाह...बहुत अच्छा है.

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

माना कि बहुत कुछ पाया था खुदा से तूने
लेकिन क्या मकसद ए जिंदगी भी पाया है तूने

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

माना कि बहुत कुछ पाया था खुदा से तूने
लेकिन क्या मकसद ए जिंदगी भी पाया है तूने ?

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

बराए मेहरबानी आप रूखा शब्द को 'रुका' लिख कर दुरुस्त कर लें ।

Sadhana Vaid ने कहा…

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण प्रस्तुति ! बधाई एवं शुभकामनाएं

उस्ताद जी ने कहा…

4.5/10

ग़ज़ल ठीक-ठाक है लेकिन ज्यादा असर पैदा नहीं कर पायी. आखिर के तीनों शेर में एकरसता आ गयी है.

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

मिलती है सभी को अगर मौहब्बत नसीबोँ के खेल से
फिर मिटा क्यूँ रहा है लकीरोँ को हाथोँ से मेरे

आपकी ही तरह किसी ने कहा है - 'जिन्दगी प्यार की दो चार घड़ी होती है'
किसके हिस्से में कितना क्या देना है? ये तो ऊपर वाले ने निश्चित कर दिया. सुंदर अभिव्यक्ति !

DR.ASHOK KUMAR ने कहा…

@अनुपमा पाठक जी
@शाहिद मिर्जा जी
@डाँ. अनवर जमाल जी
@साधना जी
@उस्ताद जी

आप सभी का ब्लोग पर आने तथा अमूल्य सुझावो और उत्साहबर्धन के लिए बहुत- बहुत आभार जी।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

वक्त की अगर कोई सीमा होती तो
वो कद्र करता हर जज्बात की मेरे ...

खूबसूरत शेर है ... ग़ज़ल अच्छी बन पड़ी है ..

नीरज गोस्वामी ने कहा…

डाक्टर साहब आपकी रचना में भाव पक्ष बहुत अच्छा है लेकिन तकनिकी पक्ष कमज़ोर है...मेरी बात का बुरा न मानते हुए मैं आप से गुज़ारिश करता हूँ के आप गज़ल के नियमों का अध्ययन करें और फिर लिखें इस से आप के लेखन में धार आ जायेगी...
लिखते रहें क्यूँ की लगातार लिखने से भी लेखन परिष्कृत होता है...
उम्मीद करता हूँ के आप मेरी बात को अन्यथा नहीं लेंगे और अगर मेरी बात बुरी लगी हो तो मुझे क्षमा करेंगे.

नीरज

उस्ताद जी ने कहा…

@ नीरज गोस्वामी जी आपकी प्रतिक्रिया बहुत सुखद लगी. जो बात मैं कहना चाहता था, वह बात आपने कह दी. रही बात बुरा मानने की तो .. वह रचनाकार/कलाकार क्या जो अपनी कमियों को न जानना चाहे. सृजन से जुड़े हर व्यक्ति को आलोचना का खुले दिल से स्वागत करना चाहिए.
इस तरह की सार्थक प्रतिक्रियाएं हों तो मेरी कोई जरूरत ही नहीं.

Ramesh singh ने कहा…

सही कहा है क्योँ मिटा रही हैँ वो लकीरोँ को हाथोँ से। सुन्दर अभिव्यक्ति। बधाई!

Ramesh singh ने कहा…

सही कहा है क्योँ मिटा रही हैँ वो लकीरोँ को हाथोँ से। सुन्दर अभिव्यक्ति। बधाई!