रविवार, नवंबर 28, 2010

दो दिल टूटे , बिखरे टूकड़े सारे


दो दिल टूटे , बिखरे टूकड़े सारे,
तड़प तड़प वो दिन कैसे गुजारे,

रह रह के दिल मेँ टीस उठती है,
इस कदर जैसे कोई खंजर मारे हमारे,



जख्मीँ करके वो ऐसे चले गये,
आसमाँ से जैसे ओझल हुये तारे,

फाँसले दरमियाँ कुछ ऐसे बन गये,
किनारोँ के बीच जैसे बहते पानी के धारे,

बीते हैँ पल तन्हा यूँ जिंदगी के हमारे,
गुजरते हैँ पतझड़ मेँ जैसे मौसम बेचारे,

29 टिप्पणियाँ:

केवल राम ने कहा…

जख्मीँ करके वो ऐसे चले गये,
आसमाँ से जैसे ओझल हुये तारे,
बहुत खूब ..यह तो अक्सर होता है इश्क में ..
चलते- चलते पर आपका स्वागत है

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

भावों की प्रखर अभिव्यक्ति।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

जज़्बात बखूबी लिखे हैं

उस्ताद जी ने कहा…

4/10

काम चलाऊ ठीक-ठाक रचना

बरखुदार अपने ब्लॉग पोस्ट का फांट कलर बदलिए
और टेम्पलेट भी. बहुत अजीब है और पढने में असुविधा भी होती है.

Dr. Ashok palmist blog ने कहा…

@केवल राम जी
@प्रवीण पाण्डेय जी
@संगीता स्वरूप जी
@उस्ताद जी

आप सभी का ब्लोग पर आने तथा हौसला अफजाई के लिए तहेदिल से शुक्रिया।

वन्दना ने कहा…

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (29/11/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

यशवन्त ने कहा…

बेहद खूबसूरत भावाभिव्यक्ति.

सादर

अनुपमा पाठक ने कहा…

बढ़िया!

Dr. Ashok palmist blog ने कहा…

वन्दना जी इस रचना को चर्चा मंच पर स्थान देने के लिए तथा उत्साहबर्धन और आपके स्नैह के लिए तहेदिल से शुक्रिया।

Dr. Ashok palmist blog ने कहा…

यशवन्त जी एवं अनुपमा पाठक जी
आपका ब्लोग पर आने तथा अपनी स्नैही टिप्पणीयोँ से उत्साहबर्धन का बहुत-बहुत शुक्रियाँ।

Dr. Ashok palmist blog ने कहा…

यशवन्त जी एवं अनुपमा पाठक जी
आपका ब्लोग पर आने तथा अपनी स्नैही टिप्पणीयोँ से उत्साहबर्धन का बहुत-बहुत शुक्रियाँ।

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बेहतरीन रचना...वाह...


नीरज

Shah Nawaz ने कहा…

बीते हैँ पल तन्हा यूँ जिंदगी के हमारे,
गुजरते हैँ पतझड़ मेँ जैसे मौसम बेचारे



वाह! बेहतरीन!

नरेश सिह राठौड़ ने कहा…

विरह की वेदना का साकार चित्रण |

Bhushan ने कहा…

जज़्बातों की सटीक अभिव्यक्ति. हिंदी कविताई का उदास चेहरा आपकी रचनाओं में भी दिख रहा है.

Sadhana Vaid ने कहा…

सुन्दर रचना ! दिल की व्यथा को बखूबी अभिव्यक्ति दी है ! बधाई एवं शुभकामनाएं !

Ravindra Ravi ने कहा…

क्या बात है!

Dr. Ashok palmist blog ने कहा…

@नीरज गोस्वामी जी
@शाहनबाज जी
@नरेश सिँह राठोर जी
@भूषण जी
@साधना वैद जी
@रविन्द्र रवि जी

आप सभी का ब्लोग पर आने तथा हौसला बढ़ाने और स्नैह के लिए दिल से शुक्रिया जी।

तिलक राज कपूर ने कहा…

खूब अनुभव हैं आपके साहब।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

रह रह के दिल मेँ टीस उठती है,
इस कदर जैसे कोई खंजर मारे हमारे,

दिल टूटने की सच्चाई को शब्द दे दिया है आपने ... बहुत खूब ...

Kunwar Kusumesh ने कहा…

premparak kavita bhi achchhi aur side show bhi sundar

Surendra Singh Bhamboo ने कहा…

रह रह के दिल मेँ टीस उठती है,
इस कदर जैसे कोई खंजर मारे हमारे,
अति सुन्दर रचना मन को छू लेने वाले विचारों को इस रचना में पिरोकर आपने बहुत ही सुन्दर बना दिया है।
हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

मालीगांव
साया
लक्ष्य

निर्मला कपिला ने कहा…

बीते हैँ पल तन्हा यूँ जिंदगी के हमारे,
गुजरते हैँ पतझड़ मेँ जैसे मौसम बेचारे,
bबहुत अच्छा प्रयास है। लिखते रहिये। शुभकामनायें।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

बहुत अच्छा प्रयास है ।
मात्राओं का ध्यान रखना ज़रूरी है ।

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

खूबसूरत भावाभिव्यक्ति....

Dr. Ashok palmist blog ने कहा…

>>>तिलक राज कपूर जी रचना को पढ़कर सराहने के लिए धन्यवाद।

>>>दिगम्बर नासवा जी उत्साह बढ़ाने और आपके स्नैह के लिए शुक्रियाँ।

>>> कुवँर कुशमेश जी हौसला अफजाई और रचना को सराहने के लिए आपका दिल से आभार ।

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

दिन में तो देखे हाथ प्यारे प्यारे
रात में भी हाथ ऊँचा तू मारे

ज्योतिषी बनकर भाग बांचे छोरियों का
तीर नैनन के खात है प्यारे प्यारे

पेश है एक ग़ज़ल

अजीब लोग हैं क्या मुंसिफ़ी की है
हमारे क़त्ल को कहते हैं ख़ुदकुशी की है

ये बांकपन था हमारा के ज़ुल्म पर हमने
बजाए नाला-ओ-फ़रियाद शायरी की है

ज़रा से पांव भिगोए थे जाके दरिया में
ग़ुरूर ये है कि हमने शनावरी की है

इसी लहू में तुम्हारा सफ़ीना डूबेगा
ये क़त्ल-ऐ-आम नहीं तुमने ख़ुदकुशी की है

हमारी क़द्र करो चौदहवीं के चाँद हैं हम
ख़ुद अपने दाग़ दिखाने को रौशनी की है

उदासियों को 'हफ़ीज़' आप अपने घर रखें
के अंजुमन को ज़रूरत शगुफ़्तगी की है

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

दिन में तो देखे हाथ प्यारे प्यारे
रात में भी हाथ ऊँचा तू मारे

ज्योतिषी बन भाग बांचे छोरियों का
तीर नैनन के खात है प्यारे प्यारे

पेश है एक ग़ज़ल

अजीब लोग हैं क्या मुंसिफ़ी की है
हमारे क़त्ल को कहते हैं ख़ुदकुशी की है

ये बांकपन था हमारा के ज़ुल्म पर हमने
बजाए नाला-ओ-फ़रियाद शायरी की है

ज़रा से पांव भिगोए थे जाके दरिया में
ग़ुरूर ये है कि हमने शनावरी की है

इसी लहू में तुम्हारा सफ़ीना डूबेगा
ये क़त्ल-ऐ-आम नहीं तुमने ख़ुदकुशी की है

हमारी क़द्र करो चौदहवीं के चाँद हैं हम
ख़ुद अपने दाग़ दिखाने को रौशनी की है

उदासियों को 'हफ़ीज़' आप अपने घर रखें
के अंजुमन को ज़रूरत शगुफ़्तगी की है

Ayodhya Prasad ने कहा…

बहुत बेहतरीन ...हमारे ब्लोग पर आपका स्वागत है