रविवार, फ़रवरी 06, 2011

देखे थे जो मैँने ख्याब

देखे थे जो मैँने ख़्वाब ,
हर ख़्वाब का खून हुआ है ।

दूर दूर तक नहीँ है कोई ,
वीराना चारोँ ओर बसा है ।

कहने को साथी हैँ सब मेरे ,
दुश्मन नहीँ है कोई इनमेँ ।

ना जाने फिर भी क्यूँ मुझको ,
इन सब से डर लगा हुआ है ।

33 टिप्पणियाँ:

संजय भास्‍कर ने कहा…

ना जाने फिर भी क्यूँ मुझको ,
इन सब से डर लगा हुआ है ।
बेहतरीन कहूँ तो कम होगा कहना !

संजय भास्‍कर ने कहा…

लाजवाब......बेहतरीन गजल.... हर लाइन में सच्चाई है....

संजय भास्‍कर ने कहा…

एक एक पंक्ति बेहद प्रभावशाली!

Patali-The-Village ने कहा…

बेहद प्रभावशाली गजल|

www.navincchaturvedi.blogspot.com ने कहा…

विचारों को अच्छी तरह सजाते हैं आप|

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अभिव्यक्ति की सहजता।

Kailash Sharma ने कहा…

कहने को साथी हैँ सब मेरे ,
दुश्मन नहीँ है कोई इनमेँ ।

ना जाने फिर भी क्यूँ मुझको ,
इन सब से डर लगा हुआ है

बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

केवल राम ने कहा…

कहने को साथी हैँ सब मेरे ,
दुश्मन नहीँ है कोई इनमेँ ।
ना जाने फिर भी क्यूँ मुझको ,
इन सब से डर लगा हुआ है ।

आदरणीय डॉ . अशोक जी
आपकी रचना आज के हालत को वयां करती है ...आपने जिस तत्परता से अपनी भावनाओं को शब्द दिए हैं ...आपकी रचना कौशलता को दर्शाते हैं ..आपका आभार

vandan gupta ने कहा…

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (7/2/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com

Anamikaghatak ने कहा…

ek ek shabda dil me utar gaya.........bahut sundar

amit kumar srivastava ने कहा…

this is the real truth..

Sadhana Vaid ने कहा…

बहुत सुन्दर !

Dorothy ने कहा…

सुंदर रचना. आभार.
सादर,
डोरोथी.

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

बहुत खूब... सुन्दर लिखा ...

Sushil Bakliwal ने कहा…

बेहद सुन्दर प्रस्तुति...

रविंद्र "रवी" ने कहा…

लाजवाब!!!

रविंद्र "रवी" ने कहा…

कहने को साथी हैँ सब मेरे ,
दुश्मन नहीँ है कोई इनमेँ ।
वा क्या बात कही है आपने!

संजय भास्‍कर ने कहा…

वसंत पंचमी की ढेरो शुभकामनाए

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

prabhavshali rachna..!!

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

प्रिय अशोक जी
नमस्कार !

ना जाने फिर भी क्यूँ मुझको ,
इन सब से डर लगा हुआ है

आदमी से ख़तरनाक कोई नहीं , इसलिए डर तो लगेगा ही … :)
अच्छा काव्य प्रयास है , लगे रहें । हां, सुधार कर ख़्वाब करलें ख्याब के स्थान पर ।

बसंत पंचमी सहित बसंत ॠतु की हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं !
- राजेन्द्र स्वर्णकार

DR.ASHOK KUMAR ने कहा…

>>> संजय भास्कर जी
>>> पाटली दी विलेज जी
>>> नवीन सी चर्तुवेदी जी
>>> प्रवीण पाण्डेय जी

आप सभी ने ब्लोग पर आकर जो प्रोत्साहन दिया हैँ मैँ आपका आभारी हूँ ।

DR.ASHOK KUMAR ने कहा…

>>> कैलाश सी शर्मा जी
>>> केवल राम जी
>>> वन्दना जी
>>> अना जी

आप सभी के इस प्रोत्साहन और स्नैह का तहेदिल से शुक्रियाँ ।

Kunwar Kusumesh ने कहा…

कहने को साथी हैँ सब मेरे ,
दुश्मन नहीँ है कोई इनमेँ ।

ना जाने फिर भी क्यूँ मुझको ,
इन सब से डर लगा हुआ है ।

क्योंकि अब आदमी जैसा दिखता है वैसा होता नहीं.

मनोज कुमार ने कहा…

खाव सच भी होते हैं नहीं भी। संशय के बादल छट भी जाते हैं।

Hindi Tech Guru ने कहा…

बहुत खूब बेहद सुन्दर प्रस्तुति......

DR.ASHOK KUMAR ने कहा…

>>> अमित-निवेदिता जी
>>> साधना वैद जी
>>> डोरोथी जी
>>> डाँ. नूतन जी

आप सभी के सहयोग और प्रोत्साहन के लिए तहेदिल से शुक्रियाँ ।

DR.ASHOK KUMAR ने कहा…

>>> सुशील बाकलीवाल जी
>>> रविन्द्र रवि जी
>>> राजेन्द्र स्वर्णकार जी
>>> मुकेश कुमार सिँहा जी

आप सभी के स्नैह और सहयोग का मैँ आभारी हूँ ।

Dr. Zakir Ali Rajnish ने कहा…

सूंदर भावों की शानदार प्रस्‍तुति।

---------
ब्‍लॉगवाणी: एक नई शुरूआत।

Unknown ने कहा…

बहुत ही अच्छी रचना...
बहुत अच्छी लगी...

DR.ASHOK KUMAR ने कहा…

>>> कुवँर कुशमेश जी
>>> मनोज कुमार जी
>>> मयंक भारद्धाज जी
>>> वीना जी

आप सभी के इस उत्साहबर्धन तथा सहयोग का दिल से आभार ।

Minakshi Pant ने कहा…

its beautiful
thanx

दिगम्बर नासवा ने कहा…

प्रेम की राहों में कभी कभी ऐसा होता है ...
बहुत दिल से लिखा है ..

निर्मला कपिला ने कहा…

मन की कशमकश को खूब लिखा है। दिल को छू गयी पँक्तियाँ। शुभकामनायें।