रविवार, अप्रैल 17, 2011

बस ढूंढते रह जाओगे


चीजोँ मेँ कुछ चीज, बातोँ मेँ कुछ बातेँ,
वो होगी, जो देख नहीँ पाओगे
कुछ समय बाद, बस ढूँढते रह जाओगे ।

बच्चोँ मेँ बचपन, जवानोँ मेँ यौवन,
संतो की वाणी, कर्ण सा दानी
नल मेँ पानी, जैल सिँह सा ग्यानी
नानी की कहानी, रावण सा अभिमानी ।
कुछ सालोँ बाद, बस ढूंढते रह जाओगे ।

गाय के दूध सा मटठा, लड़कियोँ का दुपट्टा
बाप जो समझाये, बेटा जो मान जाये
चरते ढोर, नाचते मोर
चहकता पनघट, लम्बा सा घूंघट,
कुछ सालोँ बाद, बस ढूंढते रह जाओगे।

सांस लेने की ताजी हवा, सरकारी अस्पतालोँ मेँ दवा
नेताओ को चुनाव जीतने के बाद, कर्जदार को उधार देने के बाद
रिस्तोँ मेँ लिहाज, सस्ता ईलाज
कुछ सालोँ बाद, बस ढूंढते रह जाओगे ।

अध्यापक जो सुबह दिखाये, अफसर जो रिश्वत न खाये
स्कूलोँ मेँ पढ़ाई, शादियोँ मेँ शहनाई
चांद सा खिलौना, लोरी सुनकर सोना,
कुछ साल बाद, बस ढूंढते रह जाओगे ।

12 टिप्पणियाँ:

: केवल राम : ने कहा…

आज जिस तरह से संसार में हम परम्परा की चीजों को ख़तम होते हुए देख रहे हैं उस दृष्टिकोण से आपकी यह कविता सही स्थितियों को सामने लाती है ...आपका आभार
ग्यानी...ज्ञानी
रिस्तोँ ...रिश्तों

कृपया इन शब्दों को इस तरह लिखें ..!

सारा सच ने कहा…

अच्छे है आपके विचार, ओरो के ब्लॉग को follow करके या कमेन्ट देकर उनका होसला बढाए ....

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सही कहा आपने।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सी चीज़ें तो आज भी बस ढूँढ ही रहे हैं ...

सटीक और सार्थक रचना

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

गंभीर विषय पर सहज कविता..

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" ने कहा…

देश और समाजहित में देशवासियों/पाठकों/ब्लागरों के नाम संदेश:-
मुझे समझ नहीं आता आखिर क्यों यहाँ ब्लॉग पर एक दूसरे के धर्म को नीचा दिखाना चाहते हैं? पता नहीं कहाँ से इतना वक्त निकाल लेते हैं ऐसे व्यक्ति. एक भी इंसान यह कहीं पर भी या किसी भी धर्म में यह लिखा हुआ दिखा दें कि-हमें आपस में बैर करना चाहिए. फिर क्यों यह धर्मों की लड़ाई में वक्त ख़राब करते हैं. हम में और स्वार्थी राजनीतिकों में क्या फर्क रह जायेगा. धर्मों की लड़ाई लड़ने वालों से सिर्फ एक बात पूछना चाहता हूँ. क्या उन्होंने जितना वक्त यहाँ लड़ाई में खर्च किया है उसका आधा वक्त किसी की निस्वार्थ भावना से मदद करने में खर्च किया है. जैसे-किसी का शिकायती पत्र लिखना, पहचान पत्र का फॉर्म भरना, अंग्रेजी के पत्र का अनुवाद करना आदि . अगर आप में कोई यह कहता है कि-हमारे पास कभी कोई आया ही नहीं. तब आपने आज तक कुछ किया नहीं होगा. इसलिए कोई आता ही नहीं. मेरे पास तो लोगों की लाईन लगी रहती हैं. अगर कोई निस्वार्थ सेवा करना चाहता हैं. तब आप अपना नाम, पता और फ़ोन नं. मुझे ईमेल कर दें और सेवा करने में कौन-सा समय और कितना समय दे सकते हैं लिखकर भेज दें. मैं आपके पास ही के क्षेत्र के लोग मदद प्राप्त करने के लिए भेज देता हूँ. दोस्तों, यह भारत देश हमारा है और साबित कर दो कि-हमने भारत देश की ऐसी धरती पर जन्म लिया है. जहाँ "इंसानियत" से बढ़कर कोई "धर्म" नहीं है और देश की सेवा से बढ़कर कोई बड़ा धर्म नहीं हैं. क्या हम ब्लोगिंग करने के बहाने द्वेष भावना को नहीं बढ़ा रहे हैं? क्यों नहीं आप सभी व्यक्ति अपने किसी ब्लॉगर मित्र की ओर मदद का हाथ बढ़ाते हैं और किसी को आपकी कोई जरूरत (किसी मोड़ पर) तो नहीं है? कहाँ गुम या खोती जा रही हैं हमारी नैतिकता?

मेरे बारे में एक वेबसाइट को अपनी जन्मतिथि, समय और स्थान भेजने के बाद यह कहना है कि- आप अपने पिछले जन्म में एक थिएटर कलाकार थे. आप कला के लिए जुनून अपने विचारों में स्वतंत्र है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास करते हैं. यह पता नहीं कितना सच है, मगर अंजाने में हुई किसी प्रकार की गलती के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ. अब देखते हैं मुझे मेरी गलती का कितने व्यक्ति अहसास करते हैं और मुझे "क्षमादान" देते हैं.
आपका अपना नाचीज़ दोस्त रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा"

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 19 - 04 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

http://charchamanch.blogspot.com/

Kunwar Kusumesh ने कहा…

वाह अशोक जी,खूब लिखा है.

Khare A ने कहा…

majak majaak me bahut hi serious likh gaye bandhu!

badhai kabule, baise Nalo me paani to na jane kab se gayab he!
mere khayal; se wo pani, ab doodh me ja raha he!

nivedita ने कहा…

बाकी सब से सहमत हूं ,बस रावण सा अभिमानी ही अधिक दिखेगा ...

SAJAN.AAWARA ने कहा…

BAHUT KHUB KAHA. SAYAD AANE WALE KAL ME BAHUT CHIJ DUNDHNE SE NAHI MILENGI. SUNDAR RACHANA

TEJARAM JAT ने कहा…

gud sir