शनिवार, अगस्त 14, 2010

तुम ऐसे मेँ क्यूँ रुठ जाती हो?



तुम ऐसे मेँ क्यूँ रुठ जाती हो?
सावन है सावन मेँ क्यूँ दूर जाती हो?

प्रिये तुम मुझे बहुत याद आती हो?
रातोँ को तनहाईयोँ मेँ क्यूँ छोड़ जाती हो?

मन मेँ मेरे तुम प्यास जगाती हो,
मगर दिल की धड़कन क्यूँ बढ़ाती हो?

पाँव की पायल रातोँ को छनकाती हो,
दिलोँ के तार क्यूँ छेड़ जाती हो?

तन, बदन तुम मेरा महका जाती हो?
खूश्बू की तरह दिल मेँ क्यूँ समाती हो?

16 टिप्पणियाँ:

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

कविता एक ही पहरे में.

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

सुंदर.

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

वास्तव मेँ सावन होता ही मनभावन हैँ।सुन्दर अभिव्यक्ति। बधाई

ओशो रजनीश ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूबसूरती से विरह को कह दिया है ...

रानीविशाल ने कहा…

Sundar bhaav liye sundar rachana....Shubhkaamnaae!
बूढी पथराई आँखें .....रानीविशाल

DEEPAK BABA ने कहा…

ठीक कहा आपने - दिलों के तार क्यों छेड जाती हो.

Kewal krishana ने कहा…

विरह की सुन्दर अभिव्यक्ति है।आभार!

DEEPAK BABA ने कहा…

सावन बरसता तो है पर ......... विरह ली अग्नि को और ज्यादा प्रजवाल्लित कर देता है.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

खूबसूरत अभिव्यक्ति ..

वन्दना ने कहा…

बहुत सुन्दर भाव भरे हैं…………………रक्षाबंधन की बधाई

Shah Nawaz ने कहा…

तन, बदन तुम मेरा महका जाती हो
खूश्बू की तरह दिल मेँ क्यूँ समाती हो

बहुत ही भावपूर्ण रचना.... बेहद खूबसूरत!

Babli ने कहा…

पहले तो मैं आपका तहे दिल से शुक्रियादा करना चाहती हूँ मेरे ब्लॉग पर आने के लिए और टिपण्णी देने के लिए!
बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! इस शानदार और उम्दा रचना के लिए बधाई!

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति संवेदनशील हृदयस्पर्शी मन के भावों को बहुत गहराई से लिखा है

संजय भास्कर ने कहा…

मुझे आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा ! आप बहुत ही सुन्दर लिखते है ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है !
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Ramesh singh ने कहा…

बहुत ही भावपूर्ण अभिव्यक्ति ।बधाई।