सोमवार, सितंबर 06, 2010

जब तन्हा होँ किसी सफर मेँ

जब तन्हा होँ किसी सफर मेँ,
तब गीत मेरा तुम गा लेना।

     घुमड़ रहे होँ जब सोचो के बादल,
     तब तुम बर्षा बनकर रो लेना।

जब याद सताये किसी हमसफर की,
तब कल्पित मूरत तुम उसकी बना लेना।

     बेकरारी हद से जब बढ़ती जाये,
     संदेश उसे तुम अपना भिजबा देना।

बिन उसके जब जिया ना जाये,
तब दिल मेँ उसे तुम बसा लेना।
    
       लगने लगे जब ऊचाईयोँ से डर।
       इस जमीँ को थोड़ा ऊपर उठा लेना।

16 टिप्पणियाँ:

Surendra Singh Bhamboo ने कहा…

बहुत अच्छी कविता है। सुन्दर अति सुन्दर

हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

मालीगांव
साया
लक्ष्य

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

खूबसूरत भावों से सजी सुन्दर गज़ल ...

Asha ने कहा…

एक छोटी सी भावपूर्ण रचना |बधाई
आशा

मनोज कुमार ने कहा…

जब तन्हा होँ किसी सफर मेँ,
तब गीत मेरा तुम गा लेना।

घुमड़ रहे होँ जब सोचो के बादल,
तब तुम बर्षा बनकर रो लेना।
कोमल एहसास की अभिव्यक्ति।

ZEAL ने कहा…

lovely lines !

रानीविशाल ने कहा…

Bahut sundar bhavnaaen sanjoee hai aapane is rachana me ....Shubhkaamnaae.

ओशो रजनीश ने कहा…

लगने लगे जब ऊचाईयोँ से डर।
इस जमीँ को थोड़ा ऊपर उठा लेना।

वाह क्या बात कही है आपने इन पंक्तियों के द्वारा .......... अच्छी लगी आपकी कविता

गजेन्द्र सिंह ने कहा…

अच्छी पंक्तिया है ......

एक बार जरुर पढ़े :-
(आपके पापा इंतजार कर रहे होंगे ...)
http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/2010/09/blog-post_08.html

Parul ने कहा…

waah..too gud1

Shah Nawaz ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत भाव लिए हुए कविता लिखी है आपने अशोक जी.

ईद पर एक लेख लिखा है, ईद के दिन ज़रूर पढियेगा....

Babli ने कहा…

जब याद सताये किसी हमसफर की,
तब कल्पित मूरत तुम उसकी बना लेना।
सुन्दर पंक्तियाँ! ख़ूबसूरत भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना लिखा है आपने! बधाई!

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

जब याद सताये किसी हमसफर की,
तब कल्पित मूरत तुम उसकी बना लेना।
बहुत खूब ..बढ़िया लिखा आपने

girish pankaj ने कहा…

sundar prayas. mehanat rang layegee ek din.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आशा से पिरोये भाव।

Anjana (Gudia) ने कहा…

लगने लगे जब ऊचाईयोँ से डर।
इस जमीँ को थोड़ा ऊपर उठा लेना।

very profound! thank you :-)

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत अच्छी कविता है।