मंगलवार, जनवरी 11, 2011

आईँ थी जब सामने मेरे तुम


आईँ थी जब सामने मेरे तुम ,
मुस्कुराने लगे थे मेरे सारे गम ।

आ भी गये जब आमने सामने ,
फिर क्यूँ हो गई जुदा तुम ।

देखा नहीँ गौर से तुमने मुझे ,
रखती गईँ आगे बेरूखी से कदम ।

चाहो जब आके देख लो तुम्हीँ को ,
खोजते मिलेँगे हाथोँ की लकीरोँ मेँ हम ।

'अंजान' चाहता है खुद को देखना आँखोँ मेँ तुम्हारी ,
आँखोँ का आके दिखा जाओ अब तो आईना तुम ।

27 टिप्पणियाँ:

सदा ने कहा…

मुस्कुराने लगे थे मेरे सारे गम ...

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना ...बधाई ।

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

kya pyara aaina dikha diya aapne...:)

bahut bahut badhai...:)

लाल कलम ने कहा…

asdhok ji bahut sundar
bahut achhi lagi
bahut - bahut dhanywaad

रश्मि प्रभा... ने कहा…

चाहो जब आके देख लो तुम्हीँ को ,
खोजते मिलेँगे हाथोँ की लकीरोँ मेँ हम...
तब जानोगे प्रेम क्या होता है...वाह

deepti sharma ने कहा…

bahut sunder rachna
bahut khub..
..
kabhi yaha bhi aaye
www.deepti09sharma.blogspot.com

Minakshi Pant ने कहा…

तुम जहां भी रहो सर पे तो तुम्हारे ये इल्जाम है !
तुम्हारी हाथों कि लकीरों मै उनका ही तो नाम है !!
बहुत खुबसूरत ग़ज़ल !

Anjana Dayal de Prewitt (Gudia) ने कहा…

चाहो जब आके देख लो तुम्हीँ को ,
खोजते मिलेँगे हाथोँ की लकीरोँ मेँ हम

sunder panktiyan!!! wah!

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना ...बधाई

Kunwar Kusumesh ने कहा…

चाहो जब आके देख लो तुम्हीँ को ,
खोजते मिलेँगे हाथोँ की लकीरोँ मेँ हम ।

वाह वाह, क्या बात है .

www.navincchaturvedi.blogspot.com ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति अशोक भाई

DR.ASHOK KUMAR ने कहा…

>>>सदा जी
>>>मुकेश कुमार सिन्हा जी
>>>दीप जी
>>>रश्मि प्रभा जी

आप सभी का ब्लोग पर आने और हौसला अफजाई तथा आपके स्नैह का बहुत बहुत शुक्रियाँ ।

DR.ASHOK KUMAR ने कहा…

>>>दीप्ति शर्मा
>>>मीनाँक्षी पंत जी
>>>अंजना गुड़ियाँ जी
>>>संजय कुमार चौरसिया जी

आप सभी का ब्लोग पर आने और गजल को सराहने के लिए धन्यवाद ।

रचना दीक्षित ने कहा…

चाहो जब आके देख लो तुम्हीँ को ,
खोजते मिलेँगे हाथोँ की लकीरोँ मेँ हम
खूबसूरत गजल. बधाई

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत खूब।

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

भाव सुंदर हैं

Kailash Sharma ने कहा…

आईँ थी जब सामने तुम मेरे ,
मुस्कुराने लगे थे मेरे सारे गम ।

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ..बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति..

संजय भास्‍कर ने कहा…

वाह क्या बात है
बहुत ही सुन्‍दर

संजय भास्‍कर ने कहा…

"आप सभी को मकर संक्रांति के पर्व की ढेरों शुभकामनाएँ !"

DR.ASHOK KUMAR ने कहा…

>>> कुवँर कुशमेश जी
>>> नवीन जी
>>> रचना दीक्षित जी
>>> प्रवीण पांडेय जी

आप सभी का ब्लोग पर आने और प्रोत्साहन तथा उत्साह बर्धन के लिए आभारी हूँ ।

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति| बधाई|

DR.ASHOK KUMAR ने कहा…

>>>अनवर जमाल जी
>>>कैलाश सी शर्मा जी
>>>संजय भास्कर जी
>>>पाटिली दी विलेज जी

आप सभी का ब्लोग पर आने तथा आपके प्रोत्साहन और स्नैह के लिए बहुत बहुत आभार ।

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति.....मकर संक्रांति की ढेरों शुभकामनाएँ !"

Unknown ने कहा…

आईँ थी जब सामने तुम मेरे ,
मुस्कुराने लगे थे मेरे सारे गम ।

बहुत सुंदर पंक्तियां....

Shah Nawaz ने कहा…

आईँ थी जब सामने मेरे तुम ,
मुस्कुराने लगे थे मेरे सारे गम ।

बेहतरीन लिखा है...अशोक भाई!!!

नीरज गोस्वामी ने कहा…

अच्छे भावों वाली बेहतरीन रचना...इसे ग़ज़ल कहने में अभी वक्त लगेगा...लिखते रहें...

नीरज

मनोज कुमार ने कहा…

ग़ज़ल क हर शे’र प्रभावित करता है।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आ भी गये जब आमने सामने ,
फिर क्यूँ हो गई जुदा तुम ...

लाजवाब प्रस्तुति है अशोक जी ... पर ऐसा होता है अक्सर .. वो आते हैं फिर जुदा हो जाते हैं ...