रविवार, जनवरी 16, 2011

है जान से प्यारा ये दर्दे मुहब्बत


मिल-मिल के मिलने का मजा क्यूँ नहीँ देते
हर बार ज़ख्म कोई नया क्यूँ नहीँ देते

ये रात, ये तन्हाई, ये सुनसान दरीचे
चुपके से आकर जगा क्यूँ नहीँ देते

गर अपना समझते हो फिर दिल मेँ जगह दो
हैँ गैर तो महफिल से उठा क्यूँ नहीँ देते

विछड़-विछड़ के विछड़ने का भी मजा क्यूँ नहीँ देते
हर बार जख्म कोई नया क्यूँ नहीँ देते

हैँ जान से प्यारा ये दर्दे मुहब्बत
'अंजान' कब मैँने कहा तुमसे दवा क्यूँ नहीँ देते

26 टिप्पणियाँ:

: केवल राम : ने कहा…

दर्द को जो शब्द दिए हैं ..उनका कोई जबाब नहीं ....अंतिम शेर बहुत प्रभावी है ......आपका आभार इस भावपूर्ण गजल के लिए

Kailash C Sharma ने कहा…

गर अपना समझते हो फिर दिल मेँ जगह दो
हैँ गैर तो महफिल से उठा क्यूँ नहीँ देते

बहुत लाज़वाब शेर...बहुत भावपूर्ण गज़ल.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

गर अपना समझते हो फिर दिल मेँ जगह दो
हैँ गैर तो महफिल से उठा क्यूँ नहीँ देते
...waah

मनोज कुमार ने कहा…

इस रचना की संवेदना और शिल्पगत सौंदर्य मन को भाव विह्वल कर गए हैं।

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर खूबसूरत गजल. बधाई

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बेहतरीन रचना।

'साहिल' ने कहा…

गर अपना समझते हो फिर दिल मेँ जगह दो
हैँ गैर तो महफिल से उठा क्यूँ नहीँ देते

bahut khoob ghazal kahi hai.........

दिगम्बर नासवा ने कहा…

मिल-मिल के मिलने का मजा क्यूँ नहीँ देते
हर बार ज़ख्म कोई नया कयूँ नहीँ देते
पर खूब ... लाजवाब मतला है और कमाल के तेवर हैं इस ग़ज़ल में ... कमाल का शेर ....

नीरज गोस्वामी ने कहा…

गर अपना समझते हो फिर दिल मेँ जगह दो
हैँ गैर तो महफिल से उठा क्यूँ नहीँ देते

वाह...वाह....वाह...बेहतरीन
नीरज

वन्दना ने कहा…

वाह! बहुत सुन्दर गज़ल्।

Anjana (Gudia) ने कहा…

गर अपना समझते हो फिर दिल मेँ जगह दो
हैँ गैर तो महफिल से उठा क्यूँ नहीँ देते

kya baat kahi hai! wah!

वन्दना ने कहा…

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (20/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com

Dr. Ashok palmist blog ने कहा…

>>>केवल राम जी
>>>कैलाश सी शर्मा जी
>>>रश्मि प्रभा जी
>>>संजय भास्कर जी

आप सभी का ब्लोग पर आने तथा आपके प्रोत्साहन और स्नैह का बहुत बहुत शुक्रियाँ ।

Dr. Ashok palmist blog ने कहा…

>>> मनोज कुमार जी
>>> प्रवीण पाण्डेय जी
>>> साहिल जी
>>> दिगम्बर नासवा जी

आप सभी का ब्लोग पर आने तथा उत्साहबर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Ravindra Ravi ने कहा…

है जान से प्यारा ये दर्दे मोहब्बत! वाह वाह, क्या बात है. मोहब्बत वाकई जान से भी प्यारी होती है.

Kunwar Kusumesh ने कहा…

सुन्दर है

sada ने कहा…

गर अपना समझते हो फिर दिल मेँ जगह दो
हैँ गैर तो महफिल से उठा क्यूँ नहीँ देते

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

गर अपना समझते हो फिर दिल मेँ जगह दो
हैँ गैर तो महफिल से उठा क्यूँ नहीँ देते

बहुत खूबसूरत गज़ल

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

अशोक भाई, गजल का हर इक शेर जैसे दिल में उतर गया। जितनी तारीफ की जाए कम है।

---------
ज्‍योतिष,अंकविद्या,हस्‍तरेख,टोना-टोटका।
सांपों को दूध पिलाना पुण्‍य का काम है ?

Dr. Ashok palmist blog ने कहा…

>>>नीरज जी
>>>वन्दना जी
>>>अंजना (गुड़िया) जी
>>>रविन्द्र रवि जी

आप सभी का ब्लोग पर आने तथा प्रोत्साहन और प्यार के लिए तहेदिल से शुक्रियाँ ।

Dr. Ashok palmist blog ने कहा…

>>> कुवँर कुशमेश जी
>>> सदा जी
>>> संगीता स्वरूप जी
>>> जाकिर अली 'रजनीश' जी

आप सभी का ब्लाग पर आने तथा हौसला अफजाई और आपके स्नैह के लिए शुक्रिया ।

क्रिएटिव मंच-Creative Manch ने कहा…

वाह वाह, बहुत खूब

भावपूर्ण खूबसूरत गजल
बधाई
आभार

daanish ने कहा…

खुद को ग़ज़ल-सा गुनगुनाती हुई
मनोहारी रचना ....
मन की भावनाएं मुखर हो रही हैं .

Minakshi Pant ने कहा…

अपना समझतें हैं तभी तो बार -बार आते हैं दोस्त !

बहुत बेहतरीन ग़ज़ल बहुत अच्छा लगा पड़ कर !

बधाई दोस्त !

वीना ने कहा…

हैँ जान से प्यारा ये दर्दे मुहब्बत
'अंजान' कब मैँने कहा तुमसे दवा क्यूँ नहीँ देते

लाजवाब

वीना ने कहा…

बहुत उम्दा
गणतंत्र दिवस पर बधाई